परिश्रम का फल-नूतन कुमारी

परिश्रम का फल

अनिल और सुनील दो दोस्त थे। दोनों जंगल में रहते थे। वे दोनों शहद का छत्ता तोड़कर और जंगल से लकड़ियाँ काटकर शहर में बेचते थे। शहद और लकड़ियों को बेचकर जो भी पैसा मिलता था, उसी से वे किसी तरह अपना गुजारा किया करते थे। बरसात के दिनों में उन्हें बड़ी कठिनाई होती थी। इन दिनों न वे शहद लाने जा सकते थे और न ही लकड़ियाँ काटने क्योंकि बारिश के वजह से लकड़ियाँ गीली हो कर फिसलाऊ हो जाया करती थी और जंगली रास्ते कीचड़ से भर जाया करते थे।
एक दिन लगातार बारिश से परेशान होकर अनिल ने सुनील से कहा- अब क्या करें दोस्त? जो भी रूखा सूखा हमें मिल रहा था, बरसात की वजह से वो भी मिलने से रहा। सुनील ने कहा- मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें, कहाँ जाएं?🤔🤔
कुछ देर सोच कर अनिल ने सलाह दी- दोस्त कहाँ जा सकते हैं अब तो भगवान ही कोई चमत्कार कर दे। भगवान का नाम सुनते ही सुनील की आँखों में चमक आ गई। उसने सोचा- सच में यदि मुझे भगवान मिल जाते तो मैं उनसे एक जादू की थाल मांग लेता। यह थाल मुझे जीवन भर बढियाँ और स्वादिष्ट भोजन खिलाता रहता। मुझे न ही शहद तोड़ कर लाना पड़ता और न ही लकड़ियाँ बेचनी पड़ती। ऐसा सोचते सोचते वे दोनों सो गए।

रात बीती और सुबह हो गई। सुबह वे दोनों जगे तो अपनी झोपड़ी के बाहर एक साधु को बैठे हुए देखा। दोनों ने उनका आदर-सत्कार किया। जो भी घर में रूखा सूखा भोजन था, उन्होंने साधु बाबा को प्रेमपूर्वक खिलाया। उस दिन बारिश भी नहीं हुई और उन्हें बहुत सारा शहद और लकड़ियाँ भी मिली। दोनों ने साधु महराज की कई दिनों तक सेवा की।

एक दिन सुबह के समय साधु महाराज ने उनसे कहा, मैं तुम्हारे आतिथ्य-सत्कार से बहुत खुश हूँ। मांगों क्या मांगते हो? दोनों दोस्त यह सुनकर बहुत खुश हुए। सुनील बोला महाराज हमें सोचने के लिए एक रात का समय दीजिए। मैं कल सुबह आपको बता दूँगा कि हमें क्या चाहिए। साधु बोले- ठीक है। सुबह तुम अपने नेत्र बंद करके जो कुछ भी मांगोगे वह पूरा हो जाएगा।

दोनों को रात भर नींद नहीं आई। दोनों का मन बहुत विचलित था, आखिर क्या माँगू? एक तरफ सुनील को संसार के सुंदर-सुंदर पकवान खाने की इच्छा थी तो दूसरी तरफ अनिल अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंतित था।
दोनों सुबह उठे। साधु बाबा ने जैसा कहा था वैसा ही उन्होंने किया। साधु महाराज जा चुके थे लेकिन दोनों को उनकी वस्तुएँ दे गए थे। सुनील ने अनिल से पूछा, तुमनें क्या माँगा? अनिल बोला- “दोस्त आदमी की सेहत से बढकर कुछ भी नहीं होता। मैंने माँगा- मैं जो भी रूखा-सूखा खाऊँ वह मेरे पेट में पचता रहे।”
अनिल की बात सुनकर सुनील जोड़ से हँस पड़ा और बोला दोस्त तुमने इस सुनहरे मौके को गँवा दिया। उसने अपनी थाली दिखाते हुए कहा कि “देख मेरी थाली, अब चाहे कितनी भी बरसात हो, मैं काम करूँ या न करूँ, यह थाली मुझे जीवन भर मेरे पसंद के अनुसार भोजन खिलाती रहेगी।”
अनिल को किसी चीज का लालच नहीं था। वह सवेरे उठता, रस्सी, बाल्टी आदि लेकर अपने काम पर चला जाता। इधर सुनील नदी में नहा धोकर आता और कहता- “हे थाली देवी, संसार में अमीर लोग जो भोजन करते हैं आज मुझे वही ला दो।” थाली में भोजन आ जाता और सुनील खाकर सो जाता। अनिल शहद और लकड़ियाँ बेचकर शाम को घर आता, फिर कच्चा-पका भोजन बनाता, खाता फिर चैन की नींद सो जाता।
इसी प्रकार लगभग एक वर्ष बीत गए। सुनील धीरे-धीरे मोटा हो गया। अब उससे उठा भी नहीं जाता। उसके लिए पहले से ज्यादा मुसीबतें अब हो गई थी।एक दिन उसने अनिल से कहा- दोस्त मैं अब इस थाली का दिया भोजन नहीं खाऊँगा क्योंकि मैं इतना मोटा हो गया हूँ कि पेड़ पर भी नहीं चढ सकता। क्या तुम अपना रूखा-सूखा भोजन मुझे दे सकते हो और तुम इस थाल की दी हुई स्वादिष्ट भोजन करना। अनिल ने मना कर दिया। वह बोला- नहीं दोस्त बिना मेहनत से मिलने वाला भोजन जल्दी नहीं पचता और इससे हम अनेक बीमारियों के शिकार भी हो सकते हैं। मैं तो अपने रूखे-सूखे भोजन से ही संतुष्ट हूँ।
अनिल यह कहकर अपने काम पर चला गया।           सुनील को अब अपनी गलती का एहसास होने लगा। वह थाली लेकर पास के ही नदी किनारे पहुँचा और कहने लगा- “हे भगवान! मैं आपकी थाली आपको लौटा रहा हूँ। आपके दिए हाथ-पैरों से ही मेहनत करके खाना चाहता हूँ। मुझे माफ करना भगवन।”
ऐसा कहकर उसने थाली को नदी में प्रवाहित कर दी। अनिल के साथ अब सुनील भी मेहनत करने लगा। उसका मोटापा भी धीरे-धीरे कम हो गया और अब वह बीमार भी नहीं रहता था। दोनों दोस्त खुशी से अपना जीवन यापन करने लगे।
✍️✍️इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि “अपनी मेहनत और ईमानदारी से कमाया हुआ धन भगवान के वरदान से भी अच्छा साबित हो सकता है।”

नूतन कुमारी

प्राथमिक विद्यालय चोपड़ा डगरुआ
पूर्णिया, बिहार
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11 thoughts on “परिश्रम का फल-नूतन कुमारी

  1. Dr.Manoj kumar Dubey. राज्य पुरस्कार से सम्मानित प्र.अ. says:

    अपना खुन पसीना बहाकर मेहनत की कमाई में जो आनंद मिलता हैं वह और कहीं नहीं मिलता हैं।

  2. प्रकाश प्रभात,बाँसबाड़ी,बायसी,पूर्णियाँ says:

    बहुत ही सुन्दर रचना!

  3. बहुत अच्छी कहानी लगी।
    आपकी कहानी मेहनत करने की दिशा दिखाती है ।

  4. Bahut achchhi srijanatmakata…mam ….prerna bhari kahani….aap bahut aage barhengi…nirantar yu hi prayasrat rahen…👌👌👌👍👍👍🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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