चिंकी वैद्य-विजय सिंह नीलकण्ठ

विजय सिंह “नीलकण्ठ”

चिंकी वैद्य

          किसी जंगल में चिंकी नाम की एक गिलहरी अपने बच्चों के साथ एक पेड़ पर रहती थी। एक दिन वह उसी पेड़ के नीचे अपने बच्चों के साथ खेल रही थी कि देखा एक शेरनी एक हिरण का पीछा करते हुए उसी ओर दौड़ी चली आ रही है। शेरनी के पीछे उसका एक शावक भी दौड़ रहा था। शेरनी पर नजर पड़ते ही चिंकी अपने बच्चों के साथ पेड़ पर चढ़ने लगी तभी उसका एक बच्चा फिसल कर गिर पड़ा। तब-तक शेरनी हिरण का पीछा करते हुए पेड़ से दूर जा चुकी थी लेकिन पीछे दौड़ रहे शावक ने चिंकी के बच्चे को पकड़ लिया और कहने लगा कि मैं अब तुम्हें मारकर खाऊँगा जिसे सुनकर वह रोने लगा जिसकी आवाज पर चिंकी नीचे आ गई और शावक को अपने बच्चे को छोड़ देने की विनती करने लगी लेकिन शावक जिद पर अड़ा था कि मैं इसे खाऊँगा ही। तभी शेरनी भी निराश होकर वापस उसी पेड़ के पास आकर रुक गई क्योंकि हिरण उसके हाथ से निकल चुका था। अब चिंकी शेरनी से विनती करने लगी कि दीदी मेरे बच्चे को छोड़ दो मैं इस उपकार का बदला अवश्य चुकाऊँगी। शेरनी को भी रोते गिलहरी और उसके बच्चे पर दया आ गई और उसने अपने शावक को समझा-बुझाकर चिंकी के बच्चे को छुड़वा दी। अब चिंकी अपने बच्चों के साथ खुशी-खुशी जीवन बिताने लगी।
कुछ दिन बाद किसी शेरनी के रोने की आवाज सुनकर चिंकी आवाज की ओर गई तो देखा कि वही शेरनी रो रही थी और उसका शावक वहीं बेसुध लेटा पड़ा था। जब चिंकी ने उसके बेसुध होने का कारण पूछा तो शेरनी ने बताया कि किसी साँप ने मेरे बेटे को डस लिया है जिसके विष के प्रभाव से यह बेसुध पड़ा है। शायद इसकी जान नहीं बचेगी। ऐसा बोलकर वह फूट-फूट कर रोने लगी और कहने लगी कि बुढ़ापे में मेरा सहारा कौन बनेगा। मैं निःसंतान हो जाऊँगी। यह सुनकर चिंकी ने कहा कि बहन धीरज रखो मैं कुछ उपाय करती हूँ। वह तुरंत पास की झाड़ी में गई और कुछ पत्ते लेकर आई और शेरनी से बोली किसी तरह इसे अपने बेटे के मुँह में डाल दो। शेरनी ने तुरंत उन पत्तों को शावक के मुँह में डाली। कुछ देर बाद शावक के शरीर में हल-चल हुआ और  वह धीरे-धीरे उठकर बैठ गया जिसे देखकर शेरनी के साथ-साथ चिंकी भी काफी प्रसन्न हुई।
फिर शेरनी ने चिंकी से उस पत्ते के बारे में पूछी तो चिंकी बोली कि साँप और नेवले की लड़ाई होती है तो कई बार मैंने अनेक नेवलों को इसी पत्तों को खाते हुए देखा है जिससे मैंने सोचा कि यह साँप के विष को खत्म करने वाली पत्तियाँ हैं। इसलिए मैंने इन पत्तों को लाकर दिया जिससे तुम्हारा शावक ठीक हो गया। यह सुनकर शेरनी ने उनकी चतुरता और योग्यता का काफी गुणगान की और कभी भी किसी भी गिलहरी को नहीं मारने का संकल्प  भी ली और कही कि आज से मैं तुम लोगों को वैद्य की उपाधि से विभूषित करती हूँ।

विजय सिंह “नीलकण्ठ”

विजय सिंह  नीलकण्ठ 

सदस्य टीओबी टीम 

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8 thoughts on “चिंकी वैद्य-विजय सिंह नीलकण्ठ

  1. चिंकी आज से वैद्य की उपाधि प्राप्त की।।बहुत सुंदर रचना।।हार्दिक बधाई।।

  2. चिंकी वैद्य की उपाधि प्राप्त कर गई।।बहुत सुन्दर। हार्दिक बधाई।

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