समझू-विजय सिंह नीलकण्ठ

समझू           मे आई कम इन सर? समझू ने वर्ग कक्ष के दरवाजे पर खड़े होकर वर्ग शिक्षक से पूछा। हॉं-हॉं आईए, आईए, आप ही का… समझू-विजय सिंह नीलकण्ठRead more

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देवदूत-विजय सिंह नीलकण्ठ

देवदूत          एक बार शाम के समय ट्यूशन पढ़ाकर आ रहा था तो देखा कि एक ठेला वाला अपने ठेले को जोर से खींच रहा है लेकिन… देवदूत-विजय सिंह नीलकण्ठRead more

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प्यारी गुड़िया-विजय सिंह नीलकण्ठ

प्यारी गुड़िया           यह कहानी उस समय की है जब मैं पाँँच से छः साल का बच्चा था। एक दिन गाँव के मेले में एक खिलौने… प्यारी गुड़िया-विजय सिंह नीलकण्ठRead more

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दुलारी-विजय सिंह नीलकण्ठ

दुलारी           बहुत समय पहले की बात है, किसी गाँव में धनिकलाल नामक एक बकरी पालक रहता था जो बकरियों का पालन पोषण कर अपना समय… दुलारी-विजय सिंह नीलकण्ठRead more

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प्रेरणा-विजय सिंह नीलकण्ठ

प्रेरणा                     दीदी-दीदी पानी ला दूँ? दीदी ब्रश ला दूँ क्या? दीदी माँ को बता दूँ कि दीदी उठ गई है… प्रेरणा-विजय सिंह नीलकण्ठRead more

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चिंकी वैद्य-विजय सिंह नीलकण्ठ

चिंकी वैद्य           किसी जंगल में चिंकी नाम की एक गिलहरी अपने बच्चों के साथ एक पेड़ पर रहती थी। एक दिन वह उसी पेड़ के… चिंकी वैद्य-विजय सिंह नीलकण्ठRead more

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जिज्ञासा-विजय सिंह नीलकण्ठ

जिज्ञासा                 ऐसी अमूर्त भावना जो हर किसी के अंदर समाहित रहती है। यह अमूर्त होते हुए भी इतना महत्वपूर्ण है जो मानव को… जिज्ञासा-विजय सिंह नीलकण्ठRead more

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आँचल-विजय सिंह नीलकण्ठ

आँचल           आँचल शब्द को देखते या सुनते ही सबों को अपनी माँ के आँचल की याद आ जाती है जो हर दुःख-दर्द में कवच का… आँचल-विजय सिंह नीलकण्ठRead more

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चिराग-विजय सिंह “नीलकण्ठ”

चिराग           एक छोटे से गाँव के मैदान में एक छोटा सा रंगमंच तैयार था। उद्घोसक महोदय न थकते हुए लगातार लोगों को आवाज लगा रहे… चिराग-विजय सिंह “नीलकण्ठ”Read more

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सनातन की शपथ-विजय सिंह नीलकण्ठ

सनातन की शपथ           यहाँ उपस्थित ग्रामवासियों को साक्षी मानकर मैं शपथ लेता हूँ कि आज ही नहीं अभी से किसी भी सजीव की हत्या नहीं… सनातन की शपथ-विजय सिंह नीलकण्ठRead more

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